• मोदी सरकार को वक़्त मिलना चाहिए
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विजय गोयल
(लेखक पीएमओ में राज्य मंत्री रहे हैं)
 
एनडीए की मोदी सरकार का एक साल पूरा हो गया। विपक्ष इस एक साल को एक युग की तरह ले रहा है और सरकार पर कई बेबुनियाद आरोप लगा रहा है। मुझे तो विपक्ष की बौखलाहट बहुत अच्छी लग रही है, क्योंकि इससे साफ़ है कि मोदी सरकार की एक साल की उपलब्धियों से वह चौंक गया है। इसलिए विपक्ष के हमले मुझे मोदी सरकार के अच्छे कामकाज का प्रमाणपत्र महसूस हो रहे हैं।
 
सब समझते हैं कि देश में मोदी सरकार आई ही इसलिए, क्योंकि लोग 10 साल
 
तक चली मनमोहन सिंह सरकार से सख़्त नाराज़ थे। यूपीए सरकार के दौर में
 
भ्रष्टाचार, महंगाई, पॉलिसी पैरेलिसिस, नॉन गवर्नेंस चरम पर थे, इसलिए लोगों ने
 
उसे उखाड़ फेंका। सियासत के थोड़े से भी जानकार यह भी समझते हैं कि
 
मनमोहन सरकार की नाकामी के जाल में बुरी तरह उलझ जाने के बाद देश के
 
लोगों को ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए था, जो उन्हें भंवर से निकाल सके। कुछ सियासी
 
पंडितों का यह कहना सही है कि देश को किसी पार्टी के बजाए एक भरोसेमंद
 
प्रधानमंत्री की तलाश थी, जो श्री नरेंद्र मोदी के रूप में उन्होंने चुन लिया। मोदी
 
जी पर लोगों ने भरोसा इसलिए नहीं किया कि उन्होंने भारी भरकम वादे किए,
 
बल्कि इसलिए किया कि गुजरात में विकास की बहती नदी की कलकल वे अच्छी
 
तरह देख और सुन चुके थे। मोदी ने कभी दिल्ली में मीडिया को बुलाकर गुजरात
 
सरकार के कामकाज का गुणगान नहीं किया। बल्कि मीडिया ने गुजरात पहुंच कर
 
विकास की सच्ची कहानी देश को सुनाई। मोदी के काम की सुगंध ख़ुद फैली।
 
लोग यूपीए सरकार से इतने तंग आ गए थे कि उन्हें लगने लगा कि मोदी जी
 
आएंगे और एक साल में ही करिश्मा कर देंगे। लोगों को लगा कि एक साल में ही
 
उनके दिन बहुर जाएंगे। लोग मानते हैं कि सुपर हीरो की तरह मोदी ही सभी
 
समस्याओं का हल कर सकते हैं। सच्चाई यह है कि पूरे चुनाव प्रचार में नरेंद्र भाई
 
मोदी ने एक बार भी नहीं कहा कि सौ दिन में या किसी तय वक़्त में ऐसा हो
 
जाएगा, वैसा हो जाएगा।
 
मैं युगपुरुष अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री
 
रह चुका हूं, लिहाज़ा सरकार के कामकाज को क़रीब से देखा है। मुझे लगता था
 
कि पीएमओ के आदेश के बाद तो कोई सरकारी काम नहीं होने का सवाल ही नहीं
 
उठता, लेकिन मुझे महसूस हुआ कि पिछली तमाम सरकारों ने जो सिस्टम बना 
 
दिया था, उसे तोड़कर काम करना मुश्किल था। पीएमओ में रहते हुए उस वक़्त के
 
अपने अनुभव से मैं दावे से कह सकता हूं कि एनडीए की मोदी सरकार को जितना
 
प्रचंड बहुमत मिला है, उस हिसाब से प्रधानमंत्री ने एक साल में जितना काम
 
किया है, वह कोई और नहीं कर सकता। ग़ैर एनडीए सरकारें देश के विकास के
 
रास्ते में बड़े-बड़े गड्ढे कर चुकी हैं, उन्हें भरने में वक़्त लगेगा। पहले उन गड्ढों
 
को पूरी तरह पाटना है, फिर उस हक़ीक़त की ज़मीन पर विकास की नई नींवें
 
खोदनी होंगी और तब विकास का चमचमाता घर खड़ा होगा। 
 
विदेश से काला धन लाने के मामले में भी विपक्ष लोगों को बहका रहा है। विपक्ष
 
के बहकावे में आए कुछ लोगों को लगता है कि बिना हाथ-पैर हिलाए ही सबके
 
खातों में 15-15 लाख रुपए जमा हो जाएंगे। इसे व्यावहारिक तौर पर समझना
 
चाहिए। देश की सबसे बड़ी अदालत ने 2010 में मनमोहन सरकार को अनाज को
 
गोदामों में न सड़ाकर ज़रूरतमंदों के बीच मुफ़्त में बांटने का आदेश दिया था।
 
लेकिन क्या ऐसा हो पाया? तो जब देश में बर्बाद हो रहा अनाज नहीं बांटा जा
 
सका, तो फिर विदेश में जमा काले धन के मामले में इतनी जल्दबाज़ी क्यों?  इस
 
बारे में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम हो रहा है। अब विदेश में जमा काले धन
 
पर सख़्त क़ानून बन गया है। साथ ही देश में काले धन पर सख़्ती का फ़ैसला हो
 
चुका है, तो क्या मोदी सरकार को इसके लिए एक भी नंबर नहीं मिलेगा?
 
एक किस्सा सुनिए। सड़क पर एक शख़्स की कार ख़राब हो गई, वह बोनट
 
खोलकर उसे सही करने लगा, तो पीछे खड़ी कार का ड्राइवर एक-दो मिनट बाद
 
हॉर्न बजाने लगा। कुछ देर शोर सुनने के बाद ख़राब कार का ड्राइवर पीछे वाले के
 
पास आया और कहा कि उसकी कार वह ठीक कर दे, बदले में वह हॉर्न बजाता
 
रहेगा। विपक्ष इस वक़्त पीछे वाली कार के ड्राइवर की भूमिका में है। मोदी सरकार
 
को ख़राब गाड़ी मिली है, उसे सही करने में वक़्त तो लगेगा ही। ऐसे में बेकार में
 
हो-हल्ला करने का फ़ायदा क्या है?
 
विपक्ष मोदी सरकार की हर योजना का विरोध करता है, साथ ही हास्यास्पद आरोप
 
यह भी लगाता है कि मोदी सरकार कई उन योजनाओं को आगे बढ़ा रही है, जो
 
यूपीए सरकार के ज़माने की हैं। यह अजीब बात है। काम करो तो तक़लीफ़ और
 
फिर ख़ुद भी श्रेय ले लो। विपक्ष को तो नरेंद्र मोदी की तारीफ़ खुले दिमाग़ वाले
 
प्रधानमंत्री के तौर पर करनी चाहिए कि वे उनकी सरकार के वक़्त की कुछ अच्छी
 
योजनाओं को भी आगे बढ़ा रहे हैं। यूपीए सरकार की योजनाओं का विरोध यूपीए
 
के वक़्त विपक्ष में बैठी बीजेपी ने अगर किया था, तो भी प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें
 
आगे बढ़ाने के लिए चुना। बीजेपी अगर राम मंदिर की बात करती है, कांग्रेस
 
इसका विरोध करती है और अगर मंदिर पर ज़्यादा बोलने से परहेज़ करती है, तो
 
कांग्रेस आरोप लगाती है कि हमने मंदिर मुद्दा छोड़ दिया। इसी तरह के बयान
 
अनुच्छेद 370 को लेकर भी हैं। 
 
असल में मोदी सरकार ने ग़रीबों के विकास के लिए दूरगामी योजनाएं बनाई हैं,
 
जिनके नतीजे आने में वक़्त लगता है। महज़ 12 रुपये सालाना में दो लाख रुपये
 
की प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और 330 रुपये सालाना में प्रधानमंत्री जीवन
 
ज्योति बीमा योजना को ही लीजिए। अब पीएम सुरक्षा बीमा योजना का लाभ
 
किसी परिवार को बड़ी सड़क दुर्घटना के बाद ही मिलेगा। यानी एक्सीडेंट होने पर
 
ही याद आएगा कि कितनी अच्छी योजना थी। यह बात अजीब है, लेकिन सच है।
 
इसी तरह अटल पेंशन योजना के साथ-साथ सरकार की और बहुत सी योजनाओं
 
का ज़िक्र किया जा सकता है।
 
सस्ती लोकप्रियता के लिए दिल्ली की केजरीवाल सरकार की तरह मोदी सरकार भी
 
बिजली-पानी सस्ता कर सकती है। बिजली सस्ती करने के लिए दिल्ली सरकार
 
टैक्स भरने वाले लोगों का ही पैसा बिजली कंपनियों को सब्सिडी के तौर पर दे
 
रही है। दिल्ली सरकार बताए कि वह ऐसा करके क्या केंद्र सरकार पर सब्सिडी
 
सिस्टम को और बढ़ावा देने का दबाव नहीं डाल रही है? हम देश को मज़बूत और
 
तेज़ रफ़्तार बनाना चाहते हैं या सब्सिडी पर रेंगने वाला देश? क्या ग़रीब लोग
 
चाहते हैं कि सरकार हर साल उनकी झुग्गियों की मरम्मत के लिए मदद करती
 
रहे या झुग्गियों की जगह पक्के मकान बन जाएं, भले ही इसमें कुछ और वक़्त
 
लगे? लिहाज़ा मोदी सरकार के एक साल पूरे होने पर मैं तो यही कहूंगा कि इसके
 
कामकाज को सब्सिडी का चश्मा चढ़ाकर नहीं, बल्कि पूरी संवेदनशीलता से
 
आंकिए।
 
मोदी सरकार ने एक साल में विदेशों से संवेदनशील रिश्ते बनाए हैं। मालदीव में
 
पानी संकट हो, श्रीलंका से लोगों को निकालना हो या पाकिस्तान से मछुआरों को
 
छुड़वाना, भूकंप पीड़ित नेपाल की मदद हो या यमन से भारतीयों की देश वापसी
 
या फिर इराक से भी अपने नागरिकों को देश लाने का मसला, मोदी सरकार ने
 
तुरंत फ़ैसले किए और उनके नतीजे सामने हैं। कांग्रेस कहती है कि भारत में पैदा
 
होने पर शर्मिंदगी अब जाकर ख़त्म होने जैसे बयान देकर मोदी विदेश में भारतीयों
 
का सिर झुकाते हैं। कांग्रेस बताएगी कि क्या वह छोटी-छोटी बातें उछाल कर विदेश
 
में देश का सिर नहीं झुका रही है? मोदी जी ने एक दिन सूट क्या पहना, विपक्ष ने
 
बवाल मचा दिया! क्या कोई नहीं जानता कि  ऐसे आरोप लगाने वाले ख़ुद पश्चिमी
 
सभ्यता में पले-बढ़े हैं। ऐसी बातों को मुद्दा बनाते हैं, जिनका विकास से कोई
 
लेना-देना नहीं है। केवल सस्ती लोकप्रियता के लिए ऐसे बयान देते हैं।
 
जिन प्रधानमंत्री की तारीफ़ पूरी दुनिया में है, चंद नेता उनकी बुराई में लगे हैं।
 
मोदी की विदेश यात्राओं पर भी सवाल हैं। पहले साल में प्रधानमंत्री मोदी 17 देशों
 
की यात्रा पर गए और 51 दिन बिताए। दिलचस्प यह जानना होगा कि यूपीए
 
सरकार के पहले साल में तब के पीएम मनमोहन सिंह 47 दिन विदेश में रहे और
 
इस दौरान केवल 12 देशों की यात्रा की। तो यह आरोप भी पूरी तरह बेबुनियाद
 
साबित होता है।
 
बहरहाल, अगर मोदी सरकार को आंकना, तो दस साल बाद कीजिए। अगर पहले
 
साल की ही तुलना करनी है, तो मनमोहन सरकार, राजीव गांधी और इंदिरा गांधी
 
की सरकारों के पहले साल से कीजिए। अभी आप विपक्ष में हैं, पहले सरकार में
 
थे। इस नाते अपने गिरेबान में भी ज़रूर झांकिए जनाब, तभी सही तस्वीर नज़र
 
आएगी। ऐसे बात नहीं बनेगी। ये पब्लिक है, अब सब जान गई है।

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