• संस्कृति का डिज़िटल होना
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विजय गोयल
(लेखक बीजेपी के राज्यसभा सदस्य हैं और पीएमओ में मंत्री रह चुके हैं)
 
अच्छी ख़बर है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुलसीदास के महान ग्रंथ रामचरित मानस का डिजिटल संस्करण जारी कर दिया है। रामचरित मानस केवल एक महाकाव्य भर नहीं है, बल्कि हिंदुओं के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। यह ऐसा साहित्य है, जो घर-घर में मौजूद है।
 
मौजूदा दौर में पठन-पाठक की परंपरा भले ही ध्वस्त होती जा रही हो, लेकिन रामचरित मानस का पठन-पाठन आज भी ज़्यादातर हिंदू समाज में होता है। यह केवल एक धार्मिक ग्रंथ भर नहीं है, कम से कम उत्तर भारत के लोगों के लिए यह ऐसा ग्रंथ है, जो जीवनचर्या में बाक़ायदा शामिल है। प्रधानमंत्री मोदी मानते हैं कि रामचरित मानस भारत का सार है, तो यह बिल्कुल सही है। रामचरित मानस में नायक और खलनायक का द्वंद्व इतना प्रखर है कि ज़माना चाहे कोई भी हो, उसका प्रतिबिंब उसमें मिल जाएगा। आदर्श नायक, आदर्श राज्य व्यवस्था कैसी होनी चाहिए, यह हमें रामचरित मानस बताती है।
 
दरअस्ल, रामचरित मानस को हम भले ही धार्मिक ग्रंथ मानें, लेकिन जिस वक़्त यह लिखी गई, उस वक़्त देश के माहौल को ज़रूर याद रखना चाहिए। भक्ति परंपरा के महान कवि तुलसीदास ने शैवों के गढ़ रहे काशी में रहकर विष्णु के अवतार राम को महानायक का दर्जा दिलवा दिया, तो यह उस व़क्त के सामाजिक द्वंद्व को दर्शाता है। रामचरित मानस की पांडुलिपियों की सुरक्षा के लिए तुलसीदास ने गांव-गांव में अखाड़ा परंपरा को नया जीवन दिया। मानस की पांडुलिपियां युवा लठैतों की सुरक्षा में रहती थीं। तुलसीदास ने भक्ति और श्रृद्धा पर मज़बूती से पड़े संस्कृत भाषा के मकड़जाल को तोड़ा, पंडों की साज़िशों का पर्दाफ़ाश किया। भक्ति साहित्य को आम आदमी की भाषा सिखाई, तो यह बड़ा सामाजिक काम था। रूढ़ियों को तोड़ना सबके बस की बात नहीं होती, इस लिहाज़ से तुलसीदास केवल धार्मिक कवि थे, यह कहना सही नहीं होगा। तुलसीदास की ऊर्जा समाज को नई दिशा देने वाली साबित हुई, यह मानने में किसी को कोई संकोच नहीं होना चाहिए।
 
रामचरित मानस का डिजिटल संस्करण जारी करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि कलाकारों की इस पेशकश ने न सिर्फ़ संगीत साधना की है, बल्कि संस्कृति और संस्कार साधना भी की है। रामचरित मानस के एक और महान योगदान का उल्लेख मोदी जी ने किया। उनके मुताबिक मॉरीशस जैसे बहुत से देशों में भारतीय मूल के लोगों ने अपने स्थाई डेरे बसाए, तो रामचरित मानस ही थी, जिसके ज़रिए वे लोग भारत से संपर्क में रहे।
 
प्रसंगवश एक बुरी ख़बर भी ज़ेहन आ रही है। हमारे देश में धार्मिक और सामाजिक साहित्य के प्रचार-प्रसार करने वाली गीता प्रेस, गोरखपुर का नाम किसने नहीं सुना होगा? अपनी तरह का साहित्य घर-घर तक पहुंचाने वाली गीता प्रेस आज बंद पड़ी है। निश्चित ही सत्साहित्य में दिलचस्पी रखने वालों के लिए यह बुरी ख़बर है। सबको याद होगा कि गीता प्रेस ने किस तरह पिछले दौर की नई पीढ़ियों में संस्कार भरने का काम किया। कितना अच्छा कंटेंट और कितनी कम क़ीमत! हालांकि आज ज़माना डिजिटल है, लेकिन किताबों की भूमिका किसी भी दौर में कम करके नहीं आंकी जा सकती। लिहाज़ा अच्छा यही होगा कि गीता प्रेस, गोरखपुर के छापेखाने में दोबारा से हलचल शुरू हो। इसके लिए सरकार को भी अगर दख़ल करना पड़े, तो ऐसा तुरंत किया जाना चाहिए।
 
आकाशवाणी ने रामचरित मानस का डिज़िटल संस्करण तैयार किया है। यह बताना यहां अहम होगा कि आकाशवाणी के पास देश के हर हिस्से के दिग्गज कलाकारों की नौ लाख से ज़्यादा घंटों की रिकॉर्डिंग्स हैं। प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं कि इस अमूल्य ख़ज़ाने का डॉक्यूमेंटेशन विस्तार से होना चाहिए। इसी तरह दूरदर्शन की बात करें, तो उसके पास भी साहित्य, विज्ञान, कला, संस्कृति से जुड़ा अकूत ख़ज़ाना टेपों में भरा पड़ा है। ऐसे में क्या यह सवाल नहीं उठता कि ऐसे ख़ज़ाने को हम देश की युवा पीढ़ी में संस्कार भरने के लिए इस्तेमाल क्यों नहीं कर पा रहे हैं?
 
अभी मैं राजस्थान से राज्यसभा का सदस्य हूं। राजस्थान की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक पहचान से पूरी दुनिया वाक़िफ़ है। पूरी दुनिया जानती है कि अगर ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समृद्ध की बात की जाए, तो राजस्थान का ज़िक्र आए बिना वह पूरी नहीं हो सकती। इस सिलसिले में मैं राजस्थान की राजधानी जयपुर में स्थापित जवाहर कला केंद्र का ज़िक्र करना चाहूंगा। दो-ढाई दशक पहले जवाहर कला केंद्र के प्रशासन ने पूरे राज्य में एक सर्वे कराया था। इस सर्वे में गांव-गांव से जुड़े शिक्षकों और दूसरे सरकारी कर्मचारियों की मदद ली गई थी। सर्वे में गांव-गांव, ढांणी-ढांणी से यह जानकारी जुटाई गई थी कि वहां कोई ऐतिहासिक स्मृति चिन्ह हैं या नहीं। ऐतिहासिक स्मृति चिन्ह यानी पुरानी बावड़ी, मंदिर, क़िले या हवेलियां या उनके भग्नावशेष वगैरह। सर्वे के नतीजों को बाक़ायदा किताबों का रूप दिया गया था। उस वक़्त तो काम अच्छा हुआ, लेकिन बाद में हमने उस जानकारी का क्या इस्तेमाल किया, यह मुझे पता नहीं। लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूं कि उस सर्वे के नतीजों के आधार पर पर्यटन को बढ़ावा देने की कोई ईमानदार कोशिश किसी राज्य सरकार ने नहीं की।
 
जवाहर कला केंद्र में राजस्थान की कलाओं, लोकनृत्यों, लोकनाट्यों और दूसरी सांस्कृतिक विधाओं का अपार ख़ज़ाना मौजूद है। बहुत बड़ा सवाल यह है कि आज के राजस्थान के लिए यह ख़ज़ाना कितने माइने रखता है? कोई भी ख़ज़ाना जुटाने का मक़सद होता है कि ज़रूरत पड़ने पर उसे ख़र्च कर जीवन बचाया जा सके।
 
आज जब नई पीढ़ी संस्कृति से दूर होती जा रही है, तब क्या इस ख़ज़ाने का सटीक इस्तेमाल हमें नहीं करना चाहिए? हमारी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर आख़िर कब हमारे काम आएंगी? सांस्कृतिक विधाओं के संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपए हर साल ख़र्च किए जाते हैं, तो उस तमाम डॉक्यूमेंटेशन का इस्तेमाल देश के बच्चों के ज़ेहन में अच्छे भाव, देश प्रेम, समाज प्रेम की भावनाएं बचपन से ही भरने के लिए क्यों नहीं किया जा सकता? एक दिक़्क़त तो होती है कि हमारे पास साधन ही नहीं हों। लेकिन अगर साधन भरपूर मात्रा में हों, तब तो कोई बहानेबाज़ी नहीं की जा सकती। असल दिक़्क़त है तालमेल के साथ काम नहीं करने की।
 
शिक्षा प्रणाली अगर ऐसे संस्थानों से सीधे-सीधे जोड़ दी जाए, तो दोहरा फ़ायदा होगा। कलाओं के डॉक्यूमेंटेशन का एक मक़सद भी होगा और नई पीढ़ी को हम अपनी जड़ों की संस्कृति और संस्कार से परिचित भी करा पाएंगे।
 
रामचरित मानस के डिज़िटल संस्करण के बहाने मैंने प्रसंगवश सोचा, तो विचार मन में आया कि ऐसा किया जा सकता है। बात केवल जयपुर के जवाहर कला केंद्र की नहीं है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भी ऐसा ही केंद्र है- भारत भवन। देश की राजधानी दिल्ली के साथ-साथ इस तरह के केंद्र करीब-करीब सभी राज्यों में हैं। लेकिन इनकी मौजूदगी के अलावा इनकी सार्थकता क्या है? यह भी हक़ीक़त है कि जवाहर कला केंद्र या भारत भवन जैसे केंद्रों में अच्छा-ख़ासा काम हो भी रहा है, जिस पर अच्छा-ख़ासा बजट भी ख़र्च हो रहा है। तो फिर क्या यह केवल सामाजिक कलाओं के डॉक्यूमेंटेशन के लिए ही हो रहा है? इसका इस्तेमाल समाज को बनाने और आगे बढ़ाने में क्यों नहीं किया जाना चाहिए?
 
मैं चाहता हूं कि आकाशवाणी, दूरदर्शन नेशनल और दूरदर्शन के सभी क्षेत्रीय केंद्रों के साथ-साथ देश भर के तमाम साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थान तालमेल के साथ काम करें और इसे शुरुआती शिक्षा के साथ भी जोड़ा जाए। स्कूलों में आधे घंटे की डिज़िटल कक्षाएं चलाई जाएं। बच्चों को महान लोगों के ऑडियो-विडियो सुनाए जाएं। देश की महान सांस्कृतिक परंपराओं को डिज़िटल फॉर्मेट में दिखाया जाए, तो इसका बेहद सकारात्मक असर नई पीढ़ी पर पड़ेगा। ऐसा किया गया, तो आने वाली युवा पीढ़ियां अंदर से मज़बूत होंगी। हमारा देश इस समय युवाओं का देश है। 35 साल से कम उम्र के लोगों की संख्या पूरी आबादी की 60 फीसदी से ज़्यादा है। लेकिन अफ़सोस होता है कि इतनी बड़ी आबादी अपने मूल सांस्कृतिक आधार से कटी हुई दिखाई देती है। ज़्यादातर नौजवानों में हताषा-निराशा ही दिखाई देती है। ऐसे में अगर हम अपनी तमाम समृद्ध परंपराओं के डिज़िटल संस्करण तैयार कर यानी परंपरा को विज्ञान से जोड़कर युवाओं के सामने परोसेंगे, तो इससे देश और ताक़तवर होगा, इसमें कम से कम मुझे तो शक नहीं है।
 
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