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विजय गोयल
(लेखक बीजेपी के राज्य सभा सदस्य हैं)

कल अखबार में एक खबर देखकर मुझे आश्चर्य और गुस्सा दोनों आ रहा था। खबर यह थी कि सोनिया गांधी का सरकारी बंगला प्रधानमंत्री के निवास से बड़ा है या छोटा है। सोनिया गांधी जी का 15,181 वर्ग मीटर और प्रधानमंत्री का 14,101 वर्ग मीटर। इसके साथ-साथ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति के बंगले और राहुल गांधी, प्रियंका गांधी इत्यादि-इत्यादि के बंगले कितने-कितने बड़े हैं। यह जानकारी एक आरटीआई एक्टिविस्ट ने निकाली, जिसे अखबारों ने प्रमुखता से छापा।

मैं यह सोचने लगा कि कल कोई भी आरटीआई के माध्यम से यह भी पूछ सकता है कि राष्ट्रपति भवन में कितने आम के पेड़ लगे हैं और पिछली बार जो आम लगे थे, उनको बेचा गया यदि बेचा गया तो कितने में बेचा गया।

आरटीआई का मतलब तो यह है कि केवल वो जानकारी आप ले सकते हैं जो कि सरकारी फाइलों में या जिस भी कार्यालय से आपने जानकारी मांगी है, उसमें वह जानकारी पहले से उपलब्ध हो। न कि आरटीआई मांगने के बाद वह जानकारी इकट्ठी कर फाइलों में लाई जाए, पर इस बात को विभाग देख ही नहीं रहे और अंधाधुंध जानकारी उपलब्ध करवा रहे हैं। आरटीआई में ‘क्यों’ और उस बात का ‘कारण’ पूछा नहीं जा सकता, पर अलग-अलग विभाग भी बिना दिमाग लगाए जानकारियां दे रहे हैं, जिससे कि नई-नई समस्याएं पैदा हो रही हैं। आरटीआई पांच सौ शब्दों की हो सकती है पर लोग कई-कई पेज काले कर जानकारी मांग रहे हैं।  

जिस तरह से आरटीआई का दुरूपयोग हो रहा है, उसको देखकर मन बड़ा चिन्तित होता है कि छोटी-छोटी बेमतलब की चीजों पर आरटीआई डाली जा रही हैं और जानकारी मंगवाई जा रही है। जानकारी मांगने वाला यह नहीं समझता कि इससे सरकार का कितना समय बर्बाद हो रहा है, कितने सरकारी अफसर इस समय में कोई और काम कर सकते थे। इसके साथ ही कितनी स्टेशनरी जाया जा रही है। इन फाइलों को छानते-छानते कितने कागज फाइलों से इधर-उधर हो जाते होंगे, इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। 

एक दस रूपए की आरटीआई लगाकर सरकार के कितने करोड़ों रूपए इस पर अपव्यय हो रहे होंगे, इसका हिसाब लगाया जा सकता है। मैं उन सब आरटीआई वालों की बात कर रहा हूं जिनकी आरटीआई से देष और समाज का कुछ भला नहीं होने वाला और जिसके तहत लोग केवल अपने आनन्द या अपने स्वार्थ के लिए जानकारी मांग रहे हैं। 

कोई दावे के साथ यह नहीं कह सकता कि इस देश में यदि सारे राज्य मिला लिए जाएं तो आरटीआई की संख्या लाखों में है या करोड़ों में चली गई है। इसका कोई थोड़ा-बहुत हिसाब होगा भी तो वह कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के पास होगा।

आज का मीडिया भी चटपटी खबरों के लिए इस तरह की आईटीआई की जानकारियों को बढ़ावा दे रहा है। कहीं-कहीं तो यह भी सुनने में आता है कि कुछ मीडिया वालों ने आरटीआई एक्टिविस्ट की पोस्ट अपने दफ्तरों में रखी हुई है, जिसका काम केवल यह है कि आरटीआई से जानकारी निकालना है ताकि वह समाचार-पत्रों में सुर्खी बन सके। कई बार ये याचिकाएं आरटीआई लगाने वाले महज अपने प्रचार के लिए लगाते हैं कि देखिए हमने किस तरह की सनसनीखेज खबर निकाली और फिर उसे अखबारों में छपने के लिए भेज देते हैं। 

इससे भी ज्यादा मजे की बात तो यह है कि कई बार व्यक्ति आरटीआई लगाता है और उसके बाद जब उसका लम्बा-चैड़ा जवाब आता है तो उसे देखता तक नहीं। जोश में आकर हम आरटीआई लगाकर भूल जाते हैं, और फिर उसे पढ़ने की ज़हमत तक नहीं करते।  

आरटीआई एक्ट पारित करने के उद्देश्य कुछ और थे। लोगों ने जिस तरह से उसका गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, इसको देखकर क्या यह नहीं लगता कि सरकार को आरटीआई के नियमों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है ताकि लोग आरटीआई का दुरूपयोग न कर सकें। आरटीआई की तरह ही न्यायालयों में भी जनहित याचिकाओं की बाढ़ आई हुई थी। यह देखकर अच्छा लगा कि सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान लिया और तय किया कि यदि जनहित याचिका बिना मतलब के केवल अपने स्वार्थ के लिए पाई गई, तो याचिकाकत्र्ता पर भी जुर्माना लग सकता है और ऐसे कई तथाकथित समाज के हितों की पैरवी करने वाले याचिकाकत्र्ताओं पर जुर्माना लगा भी और इन जनहित याचिकाओं में कमी भी आई।  

जुर्माना तो नहीं, पर आरटीआई के दुरूपयोग करने पर यानी कि बिना मतलब की कोई जानकारी लेने के लिए लगाई गई आरटीआई पर कई बार कमिश्नर उनके खिलाफ टिप्पणी कर रहे हैं और वे संबंधित सरकारी विभागों को ऐसी आरटीआई लगाने वालों पर कार्रवाई करने की अनुशंसा भी करते हैं। वे विभाग से इस बात की भी उम्मीद करते हैं कि वे इस बात की जांच करें कि आरटीआई लगाने वालों का उदेश्य क्या था, और उनकी क्या पृष्ठभूमि रही है। इसके बावजूद भी ज्यादातर ये विभाग मामले को आगे बढ़ाने के लिए कमिश्नर की अनुशंसाओं पर कोई ध्यान नहीं देते और कहते हैं कि हमने आरटीआई में जानकारी दे दी और हमारा पीछा छूट गया, अब हम दोबारा क्यों इस पचड़े में पड़ें।

अभी बेमतलब की आरटीआई लगाने वाले लोगों पर किसी प्रकार के जुर्माने की व्यवस्था नहीं है। एक बार एक कमिश्नर ने गलती से बेमतलब की आरटीआई लगाने वाले पर पांच सौ रूपए का जुर्माना ठोक दिया तो उसकी मुसीबत आ गई क्योंकि आरटीआई वाले ने उसे न्यायालय में घसीट लिया। इसी तरह एक बार मद्रास हाई कोर्ट ने भी बेमतलब की आरटीआई लगाने पर जुर्माना लगा दिया था, पर कुछ ही दिनों में उसको वापिस लेना पड़ा, क्योंकि आरटीआई एक्ट में इसका कोई प्रावधान नहीं था।

अब तो झूठी आरटीआइयों की बाढ़ आई हुई है। लोग अपने नाम से आरटीआई न लगाकर दूसरों के नाम से आरटीआई लगा रहे हैं और तो और प्रसिद्ध आरटीआई एक्टिविस्ट सुभाश अग्रवाल के नाम से ही कम से कम पचासों झूठी आरटीआई लगा दी गई इसलिए कि इनके नाम से आरटीआई लगाएंगे तो जवाब जल्दी आएंगे और कई बार तो सुभाष अग्रवाल को यह लिखकर बताना पड़ा कि ये आरटीआई उन्होंने नहीं लगाई, बल्कि उनके नाम से गलत लगाई गई है।

हर राज्य में हजारों आरटीआई केवल एक-दूसरे को परेषान करने के लिए लगाई जा रही हैं और व्यक्तिगत दुश्मनी  निकाली जा रही है। और तो और पति अपनी कामकाजी पत्नी के खिलाफ आरटीआई लगा रहे हैं और जानकारी निकाल रहे हैं, जिससे सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।

आरटीआई के कारण जो ब्लैकमेलिंग हो रही है, वह किसी से छिपी नहीं है। यह पूरा एक व्यवसाय बन गया है। एक उदाहरण देखिए, राषन की दुकान के खिलाफ एक आरटीआई लगती है और फिर उस दुकानदार से सात सौ रूपए लेकर आरटीआई वापिस हो जाती है। इसी तरीके से अनधिकृत निर्माणों के खिलाफ आरटीआई लगती है और फिर बिल्डर से पैसे लेकर वापिस हो जाती है। 

यह सर्वविदित है कि कई बार आरटीआई खुद सरकारी विभाग के कर्मचारी जो उसी विभाग में काम कर रहे हैं, अपने ही दूसरे सहकर्मी को परेषान या नीचा दिखाने के लिए लगवाते हैं और फिर उस आरटीआई की जानकारी पर अपने ही विभाग में नज़र भी रखते रहते हैं। यह कई बार ऐसा इसलिए भी होता है कि एक ईमानदार अफसर संदेह के घेरे में आ जाए कि इसके खिलाफ तो आरटीआई लगी हुई है। 


हाल ही में प्रधानमंत्री ने दो बातें बहुत ही महत्वपूर्ण कही हैं, पहली - सभी कार्यों का डिज़ीटलिज़शन  होना चाहिए और दूसरा, ज्यादा से ज्यादा जानकारी वेबसाइट पर हो। यदि ये दो बातें हो जाती हैं तो पहले तो आरटीआई की आपश्यकता ही नहीं पड़ेगी और दूसरे यदि पड़ी भी तो उसका सीधा सा जवाब विभाग द्वारा होगा कि ‘यह जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध है।’ 

यह दुःख की बात है कि संसद को चलने नहीं दिया जा रहा और संसद में बहुत महत्वपूर्ण बिल अटके हुए है। यदि सरकार ‘सर्विस प्रोवाइडर बिल’ को लोकसभा और राज्यसभा में पारित करवाने में सफल हो जाती है, तो इसके अच्छे परिणाम होंगे, क्योंकि इसका सीधा संबंध जनता की समस्याओं से है और इसके कारण सरकार का हर विभाग इस बात के लिए बाध्य हो जाएगा कि उसको जनता की सेवाओं व समस्याओं को समयबद्ध तरीके से हल करना है। इसके पारित होने पर बहुत सारी आरटीआई षायद नहीं लगेंगी, क्योंकि ज्यादातर आरटीआई व्यक्तिगत समस्याओं के कारण लगती हैं। 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि आरटीआई एक बहुत महत्वपूर्ण हथियार जनता के पास है, पर यदि इसका इसी तरह से दुरूपयोग होता रहा तो किसी भी सरकार को इस पर पुनर्विचार करने पर विवष होना पड़ेगा। फिलहाल तो बेमतलब की आरटीआई लगाने वालों पर अंकुश लगाने की जरूरत है, नहीं तो आरटीआई प्रणाली बदनाम हो जाएगी। 
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