• कैसी छवि बना रहे सांसद
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विजय गोयल
(लेखक बीजेपी के राज्यसभा सदस्य हैं)

हाल ही में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में सांसदों के अराजक व्यवहार पर सटीक टिप्पणियां की हैं। उनका कहना सही लगता है कि विपक्षी सांसदों का मक़सद होता है महज़ मीडिया की सुर्खियां बनना। उन्हें देश के हितों से कोई लेना-देना नहीं है। मोदी ने कहा कि पिछले कुछ दिनों से संसद में जो कुछ हो रहा है, उससे देश निराश है। संसद चलाकर ही सरकार विपक्ष के सवालों के जवाब सही ढंग से दे सकती है। पीएम ने इस पर भी चिंता जताई कि हंगामे के माहौल में नए सांसदों को अपनी बात रखने का मौक़ा ही नहीं मिलता। यह सुझाव अच्छा है कि नए सांसदों को मौक़ा देने के लिए हफ्ते में कोई एक दिन तय किया जाना चाहिए। एक दिन महिला सांसदों को भी दिया जाना चाहिए। वैसे तो यह बात प्रधानमंत्री ने कही हो, लेकिन कोई बच्चा भी समझ सकता है वेल में जाकर नारेबाज़ी और हंगामा कर सदन की कार्यवाही रोकने से कैसे विरोध जताया जा सकता है। अच्छी बात तो तब कही जाएगी, जब आप अपने सवाल साफ़-साफ़ रखें और सरकार साफ़-साफ़ जवाब दे पाए। लोकसभा में प्रधानमंत्री का सार भरा भाषण सुनकर मेरे मन में सांसद के तौर पर पहले दिन से लेकर अभी तक के सफर की झलकियां कौंध गईं। 
 
सार्वजनिक जीवन में उतरने के बाद जब मैं पहली बार लोकसभा सांसद चुना गया, तो मन में बहुत जोश था। मैंने सोचा कि अब देश को मज़बूत करने के अपने सपने को पूरा करने का वक़्त आ गया है। मुझे आज भी सदस्य के तौर पर संसद में अपना पहला दिन अच्छी तरह याद है। क्या उमंग थी, कितना हौसला था कि बयान नहीं कर सकता। तीन बार लोकसभा सदस्य रहने के बाद आज में उच्च सदन राज्यसभा का सदस्य हूं।
 
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अब विपक्षी पार्टियों और कुछ सांसदों ने संसद की दुर्गति कर रखी है। दोनों सदनों में निजी एजेंडों को लेकर अनुत्पादक हंगामा कर कार्यवाही ठप करा देना आम बात है। संसद में शोर-शराबा, वेल में जाकर नारेबाज़ी करना, एक-दूसरे पर निजी कटाक्ष करना यहां तक कि कई बार हाथापाई पर उतारू हो जाना आज संसद की आम तस्वीर है। मैं रोज़ाना सैकड़ों लोगों से मिलता हूं। ज़्यादातर मुझसे पूछते हैं कि सियासी पार्टियों और सांसदों का बर्ताव इतना अराजक क्यों हो गया है? अब मैं उन्हें क्या बताऊं ? मैं भी अब मानने लगा हूं कि पार्टियों के निहित स्वार्थों ने संसद को मज़ाक बनाकर रख दिया है।
 
अभी बजट सत्र चल रहा है। विपक्ष के रवैये को देखते हुए लगता नहीं है कि उसकी मंशा देश के विकास की योजनाएं बनने देने की है। ऐसा लग रहा है कि देश भर से चुनकर आए कांग्रेस के केवल 44 सांसदों ने पूरे संसदीय लोकतंत्र को बंधक बना लिया है।
 
क्योंकि लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही आजकल टीवी पर लाइव दिखाई जाती है, लिहाज़ा देश का आम आदमी भी वह सब कुछ देखता है, जो संसद में रोज़ हो रहा है। आख़िर हम सांसद लोगों के सामने अपनी क्या छवि पेश कर रहे हैं? ज़रा सोचिए कि देश के लोगों के मन में हमारी क्या छवि बनती जा रही है?
 
कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि संसद अब महज़ एक स्कोरिंग क्लब बन कर रह गई है। बहुतों को पता होगा कि संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर ढाई लाख रुपए ख़र्च हो जाते हैं। इस तरह एक दिन की सामान्य कार्यवाही पर औसतन छह करोड़ रुपए का ख़र्च आता है। जिस दिन कार्यवाही लंबी चलती है, उस दिन ख़र्च और बढ़ जाता है। ज़रा सोचिए कि यह पैसा आता कहां से है। ज़ाहिर है कि देश के आम लोगों की जेब से ही आता है। लोकतंत्र में इससे बड़ा और क्या मज़ाक होगा कि संसद की कार्यवाही लगातार ठप रहे या फिर दिन भर रह-रह कर हंगामा होता रहे, फिर भी एक दिन में छह करोड़ रुपए ख़र्च हो जाएं। ज़रा सोचिए कि छह करोड़ रुपए से क्या-क्या हो सकता है? हज़ारों गांवों की क़िस्मत संसद की एक दिन की कार्यवाही पर होने वाले ख़र्च से बदल सकती है। लाखों ग़रीब लड़कियों की शादी हो सकती है। लघु और कुटीर उद्योगों से हज़ारों नौजवानों की क़िस्मत संवर सकती है। लेकिन हम सांसद यह सब नहीं सोचते। विकास की योजनाएं भले न बनें, हमारे व्यक्तिगत हित ज़रूर सधने चाहिए। क्या हम सांसद देश से ऊपर हो गए हैं?
 
सारे सांसद हंगामेबाज़ हों, ऐसी बात नहीं हैं। जो कामकाज को लेकर गंभीर हैं, वे कुछ नहीं कर पाते। मैंने पहले भी ज़िक्र किया है कि किस तरह संसद की कार्यवाही देखने के बाद एक स्कूल में बच्चों ने बाल संसद लगाई, तो उसमें हंगामा मारपीट तक पहुंच गया। इस वाक़ये से मैं चौंका नहीं, सोच में पड़ गया। हम बड़े जो सिखाएंगे, बच्चे वही करेंगे। पिछले साल मॉनसून सत्र के आंकड़े स्थिति साफ़ कर देते हैं। सत्र में राज्यसभा की प्रोडक्टिविटी महज़ नौ प्रतिशत रही। पिछले 15 साल में यह दूसरा मौक़ा था, जब सबसे कम कामकाज हुआ। इससे पहले 2010 के शीत सत्र में सबसे कम काम हुआ था। पिछले मॉनसून सत्र में दोनों सदनों में पहले दो हफ्ते कोई काम नहीं हुआ। इसके उलट पिछले साल के बजट सत्र में राज्यसभा में उम्मीद से ज़्यादा कामकाज हुआ और प्रोडक्टिविटी 101 प्रतिशत रही। सवाल है कि सांसद हर बार ऐसा माहौल क्यों नहीं बनाते? मॉनसून सत्र के प्रश्नकाल में केवल दो फ़ीसदी सवालों के मौखिक जवाब दिए जा सके। लोकसभा में यह आंकड़ा थोड़ा ज़्यादा 13 फीसदी रहा। इस दौरान दोनों सदनों में सांसदों की मौजूदगी अच्छी-ख़ासी रही। तो क्या सांसद केवल हंगामा करने के लिए ही पहुंचते हैं?
 
मैं राज्यसभा का सदस्य हूं, लेकिन कहना चाहता हूं कि उच्च सदन ने लोकसभा को पंगु बना कर रख दिया है। हक़ीक़त यह है कि लोकतंत्र का लोक यानी देश की जनता लोकसभा का चुनाव सीधे तौर पर करती है। ऐसे में अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए सदन को लोक के सदन यानी लोकसभा की गरिमा का सम्मान करना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि लोकसभा में हुए हर काम में अड़ंगा डाल दिया जाए।
 
मैं वक़्त-वक़्त पर संसद की कार्यवाही की गुणवत्ता बढ़ाने के सुझाव देता रहा हूं। कुछ सुझावों पर अमल भी किया गया है। लेकिन अब वक़्त आ गया है, जब बहुत से नियम-क़ायदों में संशोधन किया जाए। मेरा सुझाव है कि लोकसभा में तय दिनों में सभी सांसदों को तीन-तीन मिनट ही सही, अपने चुनाव क्षेत्र के बारे में बोलने दिया जाए। बार-बार हंगामा करने वाले सांसदों को चिन्हित किया जाए और उनकी सूची प्रचारित कराई जाए। ऐसे नियम बनाए जाएं कि वेल में आने या पर्चा लहराने या दूसरा किसी भी क़िस्म का हंगामा करने वाले सांसद के ख़िलाफ़ ख़ुद-ब-ख़ुद कोई तय कार्यवाही हो जाए। मेरा बेटा कहता है कि कुछ सांसद वॉकआउट करने के बाद दोबारा सदन में क्यों आ जाते हैं? अब मैं उसे क्या जवाब दूं? क्या कहूं कि मेरी बिरादरी के लोग केवल दिखावा करने के लिए ऐसा करते हैं, उन्हें देश के विकास से कोई लेना-देना नहीं है।
 
मैं ख़ुद भी लोकसभा का तीन बार सदस्य रहा हूं और अब बहुत से लोकसभा सांसद मेरे मित्र हैं, जो बहुत कुछ करने का इरादा लेकर संसद पहुंचे हैं, लेकिन असहाय हैं। मैं उनकी पीड़ा समझता हूं। संसद में कुछ कर नहीं पा रहे हैं और उधर लोकसभा क्षेत्र की जनता भी उन्हें ताने मारती है, क्योंकि वे उनकी समस्याएं इसलिए सुलझा ही नहीं पा रहे हैं, क्योंकि संसद में केवल हंगामा हो रहा है। मैं अपने सांसद भाइयों से अपील करता हूं कि वे संसद को अखाड़ा बनने से रोकें।
 
अड़ियल पार्टी नेतृत्व को भी अपनी बात समझाएं, उनके हर ग़लत-सही आदेश का आंख मूंदकर पालन न करें। लोकतंत्र के पवित्र मंदिर की गरिमा बचाए रखना हमारा ही काम है।
 
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