• पानी राखिए, सियासत फेंकिये
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विजय गोयल
(लेखक बीजेपी के राज्यसभा सांसद हैं)
 
हम कभी सोच सकते थे कि पानी को लेकर देश में संकट इस क़दर गहरा सकता है कि ट्रेन से पानी एक से दूसरी जगह भेजने को मजबूर होना पड़ेगा? पानी हमारी ज़िंदगी के लिए उतना ही ज़रूरी है, जितनी कि हवा और खाना। हवा को लेकर देश की राजधानी में जिस तरह सियासत की जा रही है, वह भी चिंता की बात है। लेकिन अगर आम लोग प्यास से दम तोड़ने की कगार पर पहुंच रहे हों और कोई आपको पानी देने की पेशकश कर रहा हो, तब क्या दिक्क़त हो सकती है? परेशानी यह सोचकर होती है कि आज जिंदगी के लिए सबसे ज़रूरी क़ुदरती चीज़ों को लेकर भी पार्टियां सियासत करने में जुटी हैं। इससे तो लगता है कि लोकतंत्र का ‘लोक’ अब सियासत के केंद्रबिंदु में रह ही नहीं गया है।
 
हर मुद्दे को भुनाने में लगी दिल्ली की आत्मकेंद्रित सरकार ने इसमें भी सियासत तलाश ही ली। आप सरकार ने पेशकश की कि अगर केंद्र चाहे, तो वह भी पानी की रेलगाड़ी लातूर भेज सकती है। आप सरकार ने यह नहीं देखा कि दिल्ली के कई-कई इलाक़ों में लोग एक-एक बूंद पानी को तरस रहे हैं। पानी को लेकर केंद्र की पेशकश पर उत्तर प्रदेश सरकार पैंतरे दिखा रही है। पहले से ही सूखे, ग़रीबी और ख़ुदकुशियों को लेकर सियासत के शिकार रहे यूपी के बुंदेलखंड के लोगों के साथ अब पानी की सियासत शुरू कर दी गई है। केंद्र लोगों की प्यास बुझाना चाहता है, लेकिन सत्ता के दांव-पेंचों को लगता है कि इसमें तो उनकी किरकिरी होती नज़र आ रही है, लिहाज़ा केंद्र की वॉटर ट्रेन रास्ते में रोक दी जाती है।
 
यह तो वैसा ही दुराग्रह हुआ, जैसा कि पुराने ज़माने की कई भ्रष्ट कहानियों में मिलता है। मसलन, एक ब्राह्मण ने शूद्र के हाथों से पानी नहीं पिया और अंतत: अपनी जान दे दी। ब्राह्मणत्व की मशाल हाथ में लेकर समाज के भोले-भाले लोगों को भरमाने के पाखंड को बढ़ावा देने वालों ने ऐसी कहानियां गढ़ी थीं। लेकिन अब चिंता की बात यह है कि ऐसी कई कहानियां सच होती दिख जाती हैं। राजस्थान के दूरदराज़ इलाक़ों में पानी के बहुत से कुंडों पर ताले लगाए जाने और वहां बंदूकों के साथ पहरा देने की ख़बरें आजकल आम हो गई हैं। ऐसी ख़बरें भी हर गर्मी के मौसम में मिल ही जाती हैं कि सवर्णों के पानी के स्रोत पर दलितों को फ़टकने तक नहीं दिया जाता। मजबूरन कोई पहुंच भी जाए, तो उसके साथ बेहद बुरा बर्ताव किया जाता है। कई बार हत्याकांड तक अंजाम दे दिए जाते हैं।
 
यूपी सरकार कह रही है कि उसे पानी से भरे नहीं, बल्कि ख़ाली वैगन चाहिए, जिससे कि बुंदेलखंड के पानी वाले इलाक़ों से उन्हें भरकर ज़रूरत की जगहों पर भेजा जा सके। सरकार का यह भी कहना है कि उसके पास केंद्र सरकार द्वारा भेजे गए पानी को रखने का इंतज़ाम नहीं है। कितनी हास्यास्पद बात है। चिंता की बात यही है कि पानी को लेकर इस तकरार या कहूं कि सियासी अहम की लड़ाई में प्यास से दम तोड़ रहे आदमी के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा जा रहा है। अगर हम समाज की सांस्कृतिक परंपराओं का ध्यान करें, तो भी उत्तर प्रदेश सरकार को अपनी ढपली-अपना राग अलापने की बजाए केंद्र सरकार की दरियादिली की तारीफ़ ही करनी चाहिए। हमने तो बचपन से यही सीखा है कि अगर किसी को कोई बर्तन भेजना है, तो उसे ख़ाली नहीं भेजना चाहिए। बचपन में अगर मैं किसी दोस्त का टिफ़िन घर ले आता था, तो मां उसे वापस भेजते समय उसमें मिठाई, फल या खाने-पीने की कोई दूसरी चीज़ भरकर ही लौटाती थी। मैं पूछता कि ऐसा क्यों कर रही हो, तो कहती कि बेटा हमने अपने बुज़ुर्गों से यही सीखा है।
 
उत्तर प्रदेश ने केंद्र से दस हज़ार ख़ाली टैंकरों की मांग की है। अगर केंद्र ने पहल पानी भरे टैंकर भेजकर की है, तो सियासत की बजाए पानी ज़रूरतमंदों तक पहुंचाने का काम जल्द से जल्द किया जाना चाहिए। दूसरी बात यह है कि पानी सभी को उपलब्ध रहे, इसकी ज़िम्मेदारी राज्यों की है।
 
यूपी सरकार ने साल 1998 में नोटिफ़िकेशन जारी किया था कि ज़मीन के नीचे बोरिंग का काम सेंट्रल ग्राउंड वाटर अथॉरिटी की इजाज़त के बिना नहीं किया जा सकेगा। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली से सटे ग़ाज़ियाबाद में ही साल 2015 तक किसी ने भी बोरिंग के लिए कोई आवेदन नहीं दिया था। यह जानकारी ज़िला प्रशासन ने एक आरटीआई के जवाब में दी। जबकि हक़ीक़त यह है कि इस दौरान हज़ारों सोसायटियों में ज़मीन के अंदर का पानी इस्तेमाल करने के लिए धड़ल्ले से बोरिंग कराई गई है। जब ये हालत दिल्ली से सटे एनसीआर की है, जहां हज़ारों की संख्या में बिल्डर प्रोजेक्ट बन रहे हैं, तो फिर बुंदेलखंड जैसे दूरदराज़ इलाक़ों में क्या हो रहा होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है। हां, यह बात ज़रूर है कि वहां एनसीआर के मुक़ाबले निर्माण कार्य नहीं के बराबर हो रहे हैं। फिर भी जिनके पास पैसा है, वे तो बोरिंग करा ही रहे हैं। असल मरना तो ग़रीब का है और उसी ग़रीब तक पानी पहुंचने की राह में अहम की सियासत आड़े आ रही है।
 
ऐसे वक़्त में जब पूरी दुनिया पानी को लेकर परेशान है। कहीं ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से ग्लेशियर पिघलने से समुद्र का जल-स्तर बढ़ रहा है और मॉलदीव जैसे देश के डूब जाने का ख़तरा मंडरा रहा है, तो कहीं पीने तक को एक बूंद पानी नहीं है, तब इस मसले पर राजनीति न की जाए, बल्कि केंद्र और राज्य मिलकर समस्या के समाधान की तरफ़ आगे बढ़ें, यही सही रहेगा। पानी मिल रहा है, तो ले लें। इनकार न करें। रहीम दास कह ही गए हैं-
 
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून,
पानी गए न ऊबरे, मोती- मानुस- चून।“
 
कहीं ऐसा न हो कि लोगों की प्यास भी न बुझ पाए और पानी में जाकर मोती,
मानुस यानी मनुष्य और चून यानी आटे की तरह सियासत भी उबर न पाए।

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